पुस्तक परिचय
प्रत्यक्ष सिद्धिप्रद शरभसालुव-सहित अष्टभैरव, ब्राह्मी-वैष्णवी आदि शक्तियों का अनुष्ठान-विधान एवं काम्य प्रयोग-प्रतिपादक आकाशभैरवतन्त्रम् नामक अमूल्य ग्रन्थ उमा-महेश्वर का संवादस्वरूप है। शैवतन्त्र की वाममार्ग शाखा के ग्रन्थों में सिद्धान्त गौण होते हैं, जबकि मन्त्र और यन्त्र के साथ अनुष्ठान का अतिशय महत्त्व होता है। प्रकृत आकाशभैरवतन्त्र भी इसी कोटि का एक अलौकिक ग्रन्थ है। गुरुपूजा, रुद्राभिषेक आदि अनुष्ठान के अनिवार्य कृत्यों के साथ-साथ षट्कर्म के सम्बन्ध में तत्तत् साध्य कर्मों का विवेचन भी इसमें किया गया है। मायाप्रयोग, मातृकाप्रयोग, काली-शूलिनी-दुर्गा-भैरव-महाशास्ता-प्रयोग, कतिपय महाविद्याओं की साधना, बटुकादि भैरव एवं ब्राह्मी आदि शक्तियों के वर्णन के साथ-साथ इस ग्रन्थ में पक्षिराज शरभ से सम्बद्ध बहुविध आयामों पर भी प्रकाश डाला गया है। बयासी अध्यायों में विभक्त यह एक बहुआयामी ग्रन्थ है। इसके समस्त अध्यायों की पुष्पिका में निबद्ध 'प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे' पद ग्रन्थ के वैशिष्ट्य को स्पष्टतः उद्घोषित करता है। इस डिण्डिम घोष से ही ग्रन्थ की महत्ता की सम-सामयिकता एवं व्यापकता का सहजता से अनुमान किया जा सकता है। आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदीकृत ज्ञानवती हिन्दी व्याख्या के साहचर्य से यह ग्रन्थ सामान्य लोगों के लिए सर्वथा बोधगम्य होने के साथ-साथ सदुपयोगी भी हो गया है, यह कहना सर्वथा युक्तियुक्त है।