Brihat Tantra Sara Set of 2 Vols. बृहत्तन्त्रसार:

Brihat Tantra Sara Set of 2 Vols. बृहत्तन्त्रसार:

(0 Reviews)

Product Code :CSG 431

Author : Kapildev Narayan

ISBN : 9789380326825

Bound : Hard Cover

Publishing Date : 2015

Publisher : Chaukhamba Surbharati Prakashan

Pages : 790+790

Language : Sanskrit Text with Hindi Translation

Length: 23 cm

Width : 15 cm

Height : 8 cm

Weight : 1700 gm

Availability : 49

Price:
₹1,440.00 ₹1,800.00/ 20 %

Quantity:
(49 available)

Total Price:



Share:
Brihat tantra sara is a book. In this, information about the deep secrets of Tantra Shastra has been given.  This book was written by Krishnanand Vagish (Krishnanand Agamvagish Bhattacharya). It is also called Tantrasar. Brihattantrasara is in two sections. It was composed in the year 2015. It has been published by Chaukhamba Surbharti Prakashan. Its author is Kapildev Narayan
Brihat Tantrasara or Tantrasara is a famous work on the social worship system of the various goddesses of the Dasamahavidya mentioned in various texts of Tantra Sadhana. Krishnananda Agambagish, a well-versed Tantric devotee of Tantra, wrote the famous book Brihat Tantrasara based on 170 Tantra Sadhana texts.[1] This famous work of him is appreciated all over the country.[Krishnananda was liberal, he had no bigotry about religion. Therefore, Tantrasara texts have been inserted by taking the essence of Tantra texts of Shaiva, Ganapathi, Shakta, Vaishnavism and Solar community
communityबृह तन्त्रशास्त्र का एक अत्यंत प्रामाणिक एवं सर्वमान्य ग्रन्थ है, जिसे श्रीकृष्णानन्द भट्टाचार्य ‘आगमवागीश’ ने रचा है। यह उत्कृष्ट संस्करण चौखम्भा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी द्वारा प्रकाशित किया गया है तथा इसके भाषाटीकाकार श्री कपिलदेवनारायण जी हैं। यह हार्डकवर संस्करण लगभग 1580 पृष्ठों में संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में उपलब्ध है।
इस ग्रन्थ में आगम, तन्त्र और यामल पर आधारित तन्त्रशास्त्र का व्यापक एवं व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसमें गुरु-शिष्य परम्परा, दीक्षा-विधान, मन्त्र-साधना, जप, न्यास, मण्डल, पूजाविधि, श्रीविद्या, दशमहाविद्या, भैरव-भैरवी उपासना, गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य, राम, कृष्ण, दुर्गा, काली, बगलामुखी, मातंगी, तारा, त्रिपुरसुन्दरी सहित अनेक देवताओं एवं देवियों के मन्त्र, यन्त्र, कवच, स्तोत्र और साधना-विधियाँ संग्रहीत हैं।
ग्रन्थ के पाँच परिच्छेदों एवं परिशिष्ट में मन्त्र-सिद्धि, यन्त्र-निर्माण, हवन-विधान, षोडशोपचार, रुद्राक्ष-माहात्म्य, श्रीविद्या-पूजन, योग, तर्पण, कवच, सहस्रनाम, स्तोत्र, पुरश्चर्या तथा तांत्रिक साधना का विस्तृत एवं प्रामाणिक विवरण उपलब्ध है।
इस संस्करण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अन्य तन्त्रग्रन्थों में जहाँ अनेक मन्त्र सांकेतिक रूप में दिये गये हैं, वहीं इस ग्रन्थ में उनका सरल हिन्दी भाष्य एवं स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की गई है, जिससे साधकों, शोधकर्ताओं एवं तन्त्रशास्त्र के विद्यार्थियों को अध्ययन एवं समझने 
गंभीर अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी एवं संग्रहणीय है।
प्रथम परिच्छेद– प्रथम परिच्छेद में मङ्गलाचरण के उपरान्त गुरु और शिष्य के लक्षणों के साथ-साथ उनके कर्तव्याकर्त्तव्य का भी वर्णन किया गया है। दीक्षा से सम्बन्धित आवश्यक विषय इसमें निबद्ध हैं। मन्त्र से सम्बन्धित विषय भी गुम्फित है। दीक्षास्थान और दीक्षाकाल का निर्णय भी इस प्रथम परिच्छेद में ही किया गया है। माला पर विचार किया गया है। आसन और पुरश्चरण के सम्बन्ध में  विचार किया गया है। जप के बारे में भी विचार किया गया है। जपपूजन के लिये मण्डलनिर्माण के विषय भी इसमें निबद्ध हैं।
द्वितीय परिच्छेद-द्वितीय परिच्छेद में पूजापद्धति, सन्ध्या, स्नानविधि, बहुत से देवताओं के गायत्री मन्त्र, विविध न्यास और मन्त्र उल्लिखित हैं। अनेक देवियों के मन्त्रों में भुवनेश्वरी, अन्नपूर्णा, त्रिपुरा, त्वरिता, नित्या, वज्रप्रस्तारिणी, दुर्गा, महिषमर्दिनी, जयदुर्गा, शूलिनी, वागीश्वरी, पारिजातसरस्वती आदि के मन्त्र प्रमुख हैं।
अनेक देवों के मन्त्रों में गणेश, महागणेश, हेरम्ब, हरिद्रागणेश आदि के मन्त्र गुम्फित हैं। देवियों में लक्ष्मी, महालक्ष्मी के मन्त्र हैं। देवों में सूर्य, विष्णु, राम, कृष्ण, बालगोपाल, वासुदेव, लक्ष्मीनारायण, दधिवामन, हयग्रीव, नृसिंह, हरिहर, वराह के मन्त्र उल्लिखित हैं। शिव, मृत्युञ्जय, क्षेत्रपाल, बटुकभैरव, भैरवी, त्रिपुरभैरवी, सम्पत्प्रदा भैरवी, कौलेशभैरवी, सकलसिद्धिदा भैरवी, भय-विध्वंसिनी भैरवी, चैतन्यभैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षट्‌कूटा भैरवी, नित्या भैरवी, रुद्रभैरवी, भुवनेश्वरी भैरवी के मन्त्र हैं। त्रिपुरा बाला के कई मन्त्र एवं अन्नपूर्णा भैरवी के मन्त्र हैं।
श्रीविद्या और इसके मन्त्रान्तर, परिभाषिकी, षोडशी, महाषोडशी, बीजावली षोडशी, श्रीविद्याविशेषपद्धति आदि के मन्त्र हैं। प्रचण्डचण्डिका के मन्त्र-मन्त्रान्तर, श्यामा के मन्त्र-मन्त्रान्तर एवं गुह्यकाली एवं भद्रकाली के मन्त्र भी इसमें समाहित हैं। तारामन्त्र, वीरसाधनविधि, चण्डोग्रशूलपाणिमन्त्र, मातंगी, उच्छिष्ट चाण्डालिनी, धूमावती, भद्रकाली, उच्छिष्ट गणेश, धनदा, श्मशानकाली और बगलामुखी के मन्त्र भी इस द्वितीय परिच्छेद में ही निबद्ध हैं।
तृतीय परिच्छेद-इसमें कर्णपिशाचिनी एवं मनुघोष के मन्त्र; तारिणी, सरस्वती, कात्यायनी के कल्प; दुर्गा, विशालाक्षी, गौरी, ब्रह्मश्री, राजमुखी, इन्द्र, गरुड़ के मन्त्र; हनुमत्कल्प है; विषहराग्नि मन्त्र एवं वृश्चिकादि के विषहर मन्त्र है। श्मशानकाली, महा-काली एवं ज्वालामालिनी के मन्त्र; निगडबन्ध-मोक्षणमन्त्र, चिटिमन्त्र, त्र्यम्बकमन्त्र, अमृत-सञ्जीवनी, शुक्रोपासित मृतसञ्जीवनी, आकर्षण, वशीकरण, विद्वेषण, उच्चाटन, रिपुमलरोधन, अभिचार, सुखप्रसव, अदर्शनप्रकार, योगिनीसाधन, योगिनीसाधन के समय स्थानादि का निर्णय, पूजाधार-निरूपण, यन्त्रसंस्कार एवं उनके प्रयोग भी इसमें निबद्ध है। साधक अपनी इच्छानुसार यथाविधि इनकी साधना करके अपने मनोरथ को प्राप्त कर सकते हैं।
चतुर्थ परिच्छेद– इसमें पूजा-दिग्विधान, पूजा में विहित-निषिद्ध, जपविशेष, पञ्चाङ्ग-शुद्धि, मन्त्रशुद्धि के उपाय, सिद्धिलक्षण, मन्त्रों के दोष एवं दोषशान्ति के उपाय, हवन-हेतु कुण्ड-निर्णय, नवकुण्ड-प्रयोग, कुण्ड के विशेष फल और काम्य हवन में कुण्डप्रमाण, घर बनाने के लिए लम्बाई-चौड़ाई के माप-हेतु हस्तनियम, नित्य हवन, संक्षिप्त हवन-पद्धति, बृहत् हवन-पद्धति, हवनीय द्रव्यों के परिमाण, षट्कर्म-लक्षण, कालनियम, तिथि-नियम, उपयुक्त आसन, भूतोदय और भूतमण्डल का वर्णन है।
इसी परिच्छेद में भुवनेश्वरी-कवच, अन्नपूर्णास्तोत्र, अन्नपूर्णाकवच, त्रिपुरास्तोत्र, त्रिपुराकवच, दुर्गाशतनामस्तोत्र, दुर्गाकवच, महिषमर्दिनीस्तोत्र, महिषमर्दिनीकवच, लक्ष्मीस्तोत्र, लक्ष्मीकवच, सरस्वतीस्तोत्र, गणेशस्तोत्र, श्रीकृष्णकवच, नृसिंहकवच, शिव-स्तोत्र, शिवकवच, बटुकभैरव स्तोत्र, भैरवी कवच, श्रीविद्यास्तोत्र, श्रीविद्या-कवच, महात्रिपुरसुन्दरीकवच, प्रचण्डचण्डिका (छिन्नमस्ता )-कवच, श्यामास्तोत्र, श्यामाकवच, तारास्तोत्र, तारा का त्रैलोक्यमोहन कवच, बगलामुखी स्तोत्र और मातंगी कवच भी इसी परिच्छेद में निबद्ध है।
पञ्चम परिच्छेद-इसमें पूजा के उपचारों का वर्णन किया गया है। चौसठ उपचार, अट्ठारह उपचार, षोडश उपचार, दश उपचार और पञ्चोपचार का वर्णन भी यहीं किया गया है। मणिमुक्तादि द्रव्यों के निर्माल्यकाल का कथन भी यहीं है। त्रिपुरसुन्दरी के षोडश उपचार से पूजन-विधान का वर्णन है। रुद्राक्ष-माहात्म्य, रुद्राक्षसंस्कार, प्रकारान्तर से रुद्राक्षसंस्कार में देवता और मन्त्रादि का वर्णन, नित्य-नैमित्तिकादि कार्यों के न करने का प्रायश्चित्त और उसकी परिभाषा का वर्णन भी इसी परिच्छेद में किया गया है।
विष्णु की आराधना के मन्त्र, बारह प्रकार की वैष्णव शुद्धि, विष्णु के प्रति बाईस अपराधों का वर्णन, योग के आसन, मुद्रा, धारणयन्त्र आदि का विवेचन, भुवनेश्वरीयन्त्र, त्रिपुरायन्त्र, श्रीविद्यायन्त्र, गणेशयन्त्र के निर्माण की विधि, श्रीरामयन्त्र, नृसिंहयन्त्र, गोपालयन्त्र, श्रीकृष्णयन्त्र, शिव-यन्त्र, मृत्युञ्जययन्त्र, कालीयन्त्र की निर्माण-विधि, शान्तिकर्म में ताराधारण यन्त्र, यन्त्रलेखन द्रव्य, प्रयोगान्तर, शान्ति एवं जलस्नान का वर्णन भी इसी परिच्छेद में वर्णित है।
नित्य पूजाविधि का संक्षिप्त वर्णन, श्रीविद्या की संक्षिप्त पूजन विधि, नैमित्तिक पूजाविधि, श्रीविद्या-पूजन एवं मन्त्र-यन्त्र के प्रयोग की विधि का विवेचन भी यहीं किया गया है। भुवनेश्वरी, त्वरिता, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश, सूर्य, श्रीराम, श्रीकृष्ण, दधिवामन, हयग्रीव, नृसिंह, वराह, मृत्युञ्जय, दक्षिणामूर्ति, भैरवी, सुन्दरी, छिन्नमस्ता, श्यामा के मन्त्रप्रयोग का विधान इस परिच्छेद में वर्णित है। तर्पण विधि का वर्णन भी यहीं है।
अभिचार-निग्रह के उपाय, वेतालादि की सिद्धि, बालक संस्कार, शान्तिमन्त्र एवं का विवेचन भी प्रकृत पञ्चम परिच्छेद में ही किया गया है। बकरे की बलि, कुलाचार, शिवा-बलि, कुलमार्ग की गोपनीयता, प्रातः कृत्य, दूतीयाग, यजनप्रकार, मांसादि-शोधन, शक्ति-शोधन, वीर साधकों के पुरश्चरण, साधकों के मन्त्रस्नान, सन्ध्या, आन्तर पूजा एवं हवन का विधान, पञ्चमकार की आन्तरिक पूजा, कुमारीपूजा, पूजाक्रम, योगप्रक्रिया और उसके प्रकारान्तर का वर्णन भी इस अन्तिम पञ्चम परिच्छेद में ही किया गया है।
परिशिष्ट– इसमें देवताविशेष के मन्त्र-स्तोत्रादि निबद्ध हैं। गंगामन्त्र, कार्तिकयमन्त्र, षष्ठीदेवी का मन्त्र, स्वाहा का मन्त्र, कर्मों में दक्षिणा के मन्त्र, क्रोधराज भैरव के मन्त्रों का वर्णन परिशिष्ट भाग में किया गया है। गंगाकवच, कार्तिकेयाक्ष कवच, वंशलाभनामक कवच, षष्ठीस्तोत्र, विषहरी मनसा देवी-स्तोत्र, स्वाहा का स्तोत्र, दक्षिणास्तोत्र, बलरामस्तोत्र, महाकालीस्तोत्र, नायिका-कवच, नायिकास्तोत्र, गुरुकवच, योषिदुरु का ध्यान, स्त्रीगुरुकवच, गुरुस्तोत्र, श्रीहनूमत्स्तोत्र, मातंगीस्तोत्र, धूमावतीस्तोत्र का उदृङ्कन भी परिशिष्ट भाग में ही किया गया है। कलशस्थापन, कवचसंस्कार, मन्त्रों के श्रोत्रादि का निरूपण, नेत्रनिर्णय, स्वरशक्तियाँ और मन्त्रांग-संकेत भी ग्रन्थ के परिशिष्ट भाग में ही समाहित है।
इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि जिन मन्त्रों को दुरुपयोग से बचाने के लिये अन्य ग्रन्थों में कूट सांकेतिक शब्दों में निबद्ध किया गया है, उनका स्पष्ट एवं सरल शब्दों में विवेचन इस ग्रन्थ में किया गया है, फलस्वरूप आवश्यकता के अनुसार साधकगण इसका प्रयोग सरलता से कर सकते हैं। आशा है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी की इस सेवा से राष्ट्र के साधक और जनसामान्य लाभान्वित हो सकेंगे एवं चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के अधिष्ठाता श्री नवनीत दास जी गुप्त इस महनीय ग्रन्थ को सर्वजन-सामान्य-हेतु सुलभकराकर अलौकिक यश के भाजन बनेंगे।
बृहत्तन्त्रसारः 2 भागो में (Brihat Tantra Saar Set of 2 Vols.) पुस्तक का महत्त्व
तन्त्रशास्त्र का सर्वमान्य एवं प्रामाणिक ग्रन्थ।
श्रीविद्या एवं दशमहाविद्या साधना का विस्तृत विवेचन।
मन्त्र, यन्त्र, कवच एवं पूजाविधियों का विस्तृत सं
विस्तृत संग्रह।
संस्कृत मूलपाठ के साथ सरल हिन्दी भाष्य।
शोधार्थियों, साधकों एवं तन्त्र-अध्येताओं के लिए उपयोगी।
गुरु-दीक्षा, जप, पुरश्चर्या एवं साधना-विधान का व्यवस्थित विवरण।
दुर्लभ तांत्रिक मन्त्रों एवं यन्त्रों का प्रामाणिक संकलन।
भारतीय तान्त्रिक परम्परा के अध्ययन हेतु उत्कृष्ट संदर्भ ग्रन्थ

There have been no reviews for this product yet.